भोपाल, 19 सितंबर ।
धर्म रिलिजन नहीं है, जीवन का अनुशासन है। किसी इच्छा की पूर्ति, भय, लोभ या प्राण बचाने के लिए भी धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए। सुख-दुख आते-जाते रहते हैं, लेकिन धर्म नित्य रहता है।
उज्जैन में युवा धर्म संसद के मंच से कही गई इस बात को केवल एक उद्धरण की तरह पढ़ना आसान है, पर इसे समझना उतना ही कठिन है, क्योंकि पिछले दो सौ वर्षों में हमने धर्म शब्द को ही गलत पते पर पहुंचा दिया है। हमने धर्म को रिलिजन का अनुवाद बना दिया, जबकि दोनों शब्दों की आत्मा एक-दूसरे से बिल्कुल अलग है।
रिलिजन शब्द की जड़ में एक संप्रदाय है, एक विश्वास प्रणाली है, एक ईश्वर, एक किताब, एक पैगंबर की अवधारणा है। आप मानते हैं तो आप उस रिलिजन में हैं, नहीं मानते तो बाहर हैं। धर्म इस तरह का कोई गेटेड बाड़ा नहीं है। धर्म किसी को अंदर-बाहर नहीं करता। धर्म धारण करने की क्रिया है। जो धारण करता है, जो टिकाता है, जो जोड़कर रखता है, वही धर्म है। इसीलिए हमारे यहां कहा गया—धारयति इति धर्मः।
मोहन भागवत ने अपने संबोधन में इसी भ्रम की ओर इशारा किया। उन्होंने कहा कि धर्म को लेकर भ्रम का एक कारण अपनी भाषा और धर्म के वास्तविक अर्थ को भूल जाना है। यह बात गहरी है। जब पश्चिमी यात्री भारत आए, उन्होंने यहां मंदिर में घंटी बजते देखी, आरती होते देखी, व्रत-उपवास देखा, मंत्र सुने। उन्होंने इन बाहरी क्रियाओं को देखा और अपनी भाषा में इसे रिलिजन कह दिया, क्योंकि उनके पास देखने का वही चश्मा था। बाद में हमने भी उसी चश्मे को पहन लिया और खुद को भी रिलिजन की परिभाषा में फिट करने लगे। यहां से एक बड़ी भूल शुरू हुई।
कुश्ती का उदाहरण इस भूल को बहुत अच्छे से तोड़ता है। जैसे कुश्ती सीखने के लिए अखाड़े में दंड-बैठक लगाना जरूरी है, वैसे ही धर्म के कर्मकांड और अनुशासन उसके अभ्यास का हिस्सा हैं। दंड-बैठक ही कुश्ती नहीं है, वह कुश्ती का एक अंग है, शरीर को साधने का एक उपाय है। ठीक वैसे ही पूजा, पाठ, व्रत, तीर्थ, मंत्र—ये सब धर्म का एक अंग हैं, पूरा धर्म नहीं। कोई केवल दंड-बैठक लगाता रहे और कभी दांव-पेंच न सीखे, तो वह पहलवान नहीं कहलाएगा। वैसे ही कोई केवल कर्मकांड करता रहे और जीवन में सत्य, करुणा, धैर्य, परोपकार को न धारण करे, तो वह धार्मिक नहीं कहलाएगा। रिलिजन कर्मकांड पर अटक सकता है, धर्म कर्मकांड से आगे जाता है।
हमारे शास्त्रों में धर्म को लेकर इतनी व्यापक बातें कही गई हैं। धर्म राजा का भी है, प्रजा का भी, पिता का भी है, पुत्र का भी है, व्यापारी का भी है, विद्यार्थी का भी है। वहां धर्म का अर्थ कर्तव्य और अनुशासन है। एक डॉक्टर का धर्म है कि वह रोगी को बचाए, एक शिक्षक का धर्म है कि वह ज्ञान दे, एक सैनिक का धर्म है कि वह सीमा की रक्षा करे। यह रिलिजन नहीं है। यह जीवन का वह अनुशासन है, जिसके बिना समाज टिक नहीं सकता।
सुख-दुख के पार धर्म की नित्यता—इच्छा की पूर्ति, भय, लोभ या प्राण बचाने के लिए भी धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए। यह बात आज के समय में सबसे ज्यादा असहज लगती है, क्योंकि आज का पूरा बाजार इसी बात पर टिका है कि आपकी इच्छा कैसे पूरी हो। हर विज्ञापन कहता है कि डर को छोड़ो, लोभ को अपनाओ, ज्यादा पाओ। ऐसे में यह कहना कि इच्छा, भय और लोभ के लिए भी धर्म मत छोड़ो, प्रतिकूल लगता है।
पर यही धर्म की परीक्षा है। यदि धर्म केवल सुख में ही याद आए, तो वह सुविधा है, अनुशासन नहीं। धर्म वह है, जो दुख में भी टिकाए रखे। जब लाभ नहीं है, तब भी सत्य बोलना धर्म है। जब डर लग रहा है, तब भी न्याय के पक्ष में खड़ा होना धर्म है। जब प्राण संकट में हैं, तब भी अपने सिद्धांत को न बेचना धर्म है। इसीलिए कहा गया कि सुख-दुख आते-जाते रहते हैं, लेकिन धर्म नित्य रहता है। सुख और दुख मौसम हैं, धर्म जलवायु है। मौसम बदलता है, जलवायु बनी रहती है।
आज युवा पीढ़ी के सामने धर्म को लेकर सबसे बड़ा संकट यही है। उसके पास धर्म के नाम पर दो ही विकल्प रखे जाते हैं। एक विकल्प कट्टरता का है, जहां धर्म का अर्थ है दूसरों से नफरत करना, झंडा उठाना, नारा लगाना। दूसरा विकल्प पूर्ण उपेक्षा का है, जहां धर्म का अर्थ है ढकोसला, पाखंड, पिछड़ापन। दोनों ही विकल्प अधूरे हैं। युवा इन दोनों के बीच खुद को कहीं नहीं पाता। इसीलिए वह धर्म से दूर होता जा रहा है। युवा धर्म संसद में इसी दूरी को पाटने की कोशिश है। युवा को यह बताना जरूरी है कि धर्म तुम्हें किसी भीड़ का हिस्सा बनने के लिए नहीं कहता, वह तुम्हें अनुशासित व्यक्ति बनने के लिए कहता है। सुबह उठना, समय पर काम करना, अपने माता-पिता के प्रति कर्तव्य निभाना, अपने काम में ईमानदारी रखना, कमजोर की मदद करना—यह भी धर्म है। यह किसी मंदिर या मस्जिद तक सीमित नहीं है। यह तुम्हारे रोजमर्रा के जीवन का अनुशासन है।
जब धर्म को इस रूप में देखा जाता है, तो वह बोझ नहीं लगता, वह बोझ उतारता है। रिलिजन के रूप में धर्म अक्सर बोझ लगता है, क्योंकि वहां नियमों की लंबी सूची है—यह करो, वह मत करो, यह खाओ, वह मत खाओ। पर अनुशासन के रूप में धर्म मुक्त करता है। जैसे एक संगीतकार के लिए रियाज बोझ नहीं है, वह उसकी स्वतंत्रता का आधार है। जैसे एक खिलाड़ी के लिए अनुशासन बंधन नहीं है, वह उसकी जीत का आधार है। वैसे ही जीवन का अनुशासन भी बंधन नहीं, बल्कि जीवन को टिकाने वाला आधार है।
इस दृष्टि से देखने पर धर्म की बात किसी एक संप्रदाय की बात नहीं रह जाती, वह सबकी बात बन जाती है। एक नास्तिक व्यक्ति भी धर्म का पालन कर सकता है, यदि वह अपने जीवन में सत्य और करुणा का अनुशासन रखता है और एक आस्तिक व्यक्ति धर्म से चूक सकता है, यदि वह पूजा तो करता है, पर जीवन में झूठ और हिंसा को धारण करता है। इसीलिए धर्म नित्य है, क्योंकि वह किसी मान्यता पर टिका नहीं है, वह मानव अस्तित्व को टिकाने वाले मूल्यों पर टिका है।
आज के भारत में इस समझ की सबसे ज्यादा जरूरत है। हम एक ऐसे समय में हैं, जहां हर चीज को तुरंत पहचान में बदल दिया जाता है। धर्म को भी पहचान बना दिया गया है—मेरी पहचान बनाम तुम्हारी पहचान। इससे टकराव पैदा होता है। यदि धर्म को अनुशासन के रूप में समझा जाए, तो टकराव की जगह संवाद आएगा। तब प्रश्न यह नहीं होगा कि तुम किस धर्म के हो, प्रश्न यह होगा कि तुम अपने धर्म का पालन कितनी ईमानदारी से करते हो। तुम्हारा अनुशासन क्या है?
इसलिए यह वाक्य केवल एक उपदेश नहीं है, यह एक वैचारिक सुधार का आह्वान है। धर्म को रिलिजन की नकल से मुक्त करो, उसे फिर से जीवन के अनुशासन के रूप में देखो। कर्मकांड को साधन समझो, साध्य नहीं और सुख-दुख के मौसम में अपने अनुशासन की जलवायु को बचाकर रखो। जो समाज यह करना सीख लेता है, वह टिकता है। जो नहीं सीखता, वह नारे तो लगाता है, पर भीतर से बिखर जाता है।
















