मुंबई, 21 सितंबर।
साहिल वाकोडे की मौत को केवल परीक्षा में मोबाइल पकड़े जाने, चैटजीपीटी के इस्तेमाल या कथित अनुशासनात्मक दबाव से जोड़कर देखना आसान होगा, लेकिन यही इस त्रासदी को समझने की सबसे बड़ी भूल भी होगी। आईआईटी बॉम्बे में हुई इस घटना ने देश के सबसे प्रतिष्ठित तकनीकी संस्थानों की उस तस्वीर पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं, जिसके एक हिस्से में उत्कृष्टता, उपलब्धि और सफलता की चमक है तो दूसरे हिस्से में तनाव, अकेलापन और असफल होने का भय।
साहिल की मौत के बाद उसके पिता ने प्रोफेसर पर जातिसूचक टिप्पणियों और तीन महीने तक प्रताड़ित करने के आरोप लगाए हैं। इन्हीं आरोपों के आधार पर पुलिस ने आत्महत्या के लिए उकसाने और एससी-एसटी अधिनियम की धाराओं में एफआईआर दर्ज की है। दूसरी ओर, आईआईटी बॉम्बे ने जातिगत भेदभाव के आरोपों से इनकार किया है और कहा है कि साहिल की ओर से ऐसी कोई शिकायत संस्थान के एससी-एसटी प्रकोष्ठ या प्रशासन को नहीं मिली थी। इसलिए इन आरोपों का सच जांच पूरी होने के बाद ही सामने आएगा।
संस्थान के अनुसार, परीक्षा में मोबाइल फोन के इस्तेमाल के बाद साहिल से शिक्षक और विभागाध्यक्ष ने बात की थी तथा उसे आश्वस्त किया गया था कि उसके अकादमिक भविष्य पर इसका असर नहीं पड़ेगा। इसके बावजूद कुछ घंटों बाद उसकी मृत्यु हो गई। चार सौ से अधिक छात्रों का विरोध प्रदर्शन और उसके बाद मिड-सेमेस्टर परीक्षाओं का स्थगित होना बताता है कि कैंपस के भीतर बेचैनी कितनी गहरी है।
बड़ा सवाल है कि क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था प्रतिभा को निखारने के साथ विद्यार्थी को भावनात्मक रूप से संभाल भी रही है? आईआईटी जैसे संस्थानों में प्रवेश स्वयं एक कठिन प्रतिस्पर्धा के बाद मिलता है। इसके बाद अंक, ग्रेड, शोध, इंटर्नशिप, प्लेसमेंट और भविष्य की चिंता लगातार दबाव बनाते हैं। हालिया रिपोर्टों में पिछले वर्षों में आईआईटी परिसरों में आत्महत्याओं और अन्य अप्राकृतिक मौतों की चिंताजनक संख्या सामने आई है।
आईआईटी बॉम्बे में स्टूडेंट वेलनेस सेंटर, व्यक्तिगत काउंसलिंग, समूह सहायता और चौबीसों घंटे संकट सहायता जैसी व्यवस्थाएं मौजूद हैं। लेकिन केवल सुविधा उपलब्ध करा देना पर्याप्त नहीं है। जरूरत ऐसी संस्कृति की है, जिसमें विद्यार्थी संकट आने के बाद नहीं, संकेत दिखाई देते ही सही समय सुना भी जाए।
साहिल की मौत का दोषी कौन है, यह जांच तय करेगी। लेकिन इस घटना से एक सवाल पूरे उच्च शिक्षा तंत्र के सामने खड़ा हो गया है - हम ऐसे विद्यार्थी तो बना रहे हैं जो कठिन परीक्षा पास कर सकें, लेकिन क्या हम उन्हें जीवन की कठिन परीक्षा के लिए भी तैयार कर रहे हैं? उत्कृष्टता का अर्थ केवल ऊंचे अंक और संस्थान नहीं हो सकता। किसी भी शिक्षा व्यवस्था की पहली कसौटी यह होनी चाहिए कि उसका विद्यार्थी सफलता की दौड़ में अपना जीवन न हार बैठे।
इसके साथ ही संस्थानों को शिकायतों की निष्पक्ष सुनवाई, शिक्षकों के व्यवहार की जवाबदेही और विद्यार्थियों के लिए भरोसेमंद संवाद व्यवस्था को मजबूत करना होगा। डर और चुप्पी किसी भी परिसर को सुरक्षित नहीं बना सकते।















