भोपाल, 21 सितंबर।
सोशल मीडिया पर कोई नया चलन शुरू हो और देखते ही देखते लाखों लोग उसका हिस्सा बन जाएँ, अब यह सामान्य बात है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने इस रफ्तार को और बढ़ा दिया है। अस्सी के दशक का रूप हो या किसी पुराने दौर की कल्पना, कुछ शब्द लिखिए और कुछ ही क्षणों में अपनी बदली हुई तस्वीर सामने है। यह तकनीक मनोरंजन और रचनात्मकता के लिए आकर्षक जरूर है, लेकिन इसके पीछे छिपे सवाल कहीं अधिक गंभीर हैं।
हम एआई को तस्वीर देते समय अक्सर यह भूल जाते हैं कि तस्वीर केवल एक तस्वीर नहीं है। उसमें हमारा चेहरा, पहचान और कई बार ऐसी व्यक्तिगत सूचनाएँ होती हैं, जिनका भविष्य में अलग-अलग तरीकों से इस्तेमाल संभव है। सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि अपलोड की गई तस्वीर कहाँ जाती है, कितने समय तक सुरक्षित रहती है, उसका इस्तेमाल किस उद्देश्य से किया जाता है और क्या उसे हटाने का अधिकार उपयोगकर्ता के पास है?
दूसरी चिंता डीपफेक की है। किसी व्यक्ति के चेहरे को किसी दूसरे चित्र या वीडियो पर इतनी वास्तविकता से लगाया जा सकता है कि असली और नकली में अंतर करना कठिन हो जाए। इसका इस्तेमाल धोखाधड़ी, बदनाम करने या झूठी सूचना फैलाने में हो सकता है। इसलिए आने वाले समय में केवल तस्वीर देख लेना उसकी सत्यता की गारंटी नहीं होगा।
भारत में व्यक्तिगत डिजिटल डेटा की सुरक्षा के लिए कानूनी ढांचा मौजूद है, लेकिन कानून से अधिक जरूरी नागरिकों की डिजिटल समझ है। किसी भी एआई एप पर तस्वीर डालने से पहले उसकी गोपनीयता नीति पढ़ना, अनावश्यक अनुमति से बचना और संवेदनशील तस्वीरें साझा न करना अब सावधानी नहीं, डिजिटल नागरिकता का अनिवार्य हिस्सा है। तकनीक का आनंद लीजिए, लेकिन अपनी पहचान की कीमत पर नहीं।















