भोपाल, 21 सितंबर।
मध्यप्रदेश के लोक निर्माण विभाग की इंजीनियरिंग की चर्चा अब केवल भोपाल या इंदौर तक सीमित नहीं है। यह चर्चा अब देश की सीमाओं को लांघकर पूरे विश्व में हो रही है, क्योंकि ऐसा नवाचार, ऐसा साहस और ऐसी कल्पनाशीलता दुनिया के किसी और कोने में नहीं मिलती। रोज नए-नए आयाम स्थापित हो रहे हैं और हर नया आयाम पिछले आयाम से भी ऊंचा है।
राजगढ़ का अद्भुत आरटीओ भवन—जमीन किसी की, इमारत किसी की। राजगढ़ जिले में पीडब्ल्यूडी की भवन शाखा, पीआईयू ने एक ऐसा कारनामा किया है, जिसे देखकर बड़े-बड़े आर्किटेक्ट भी अपना स्केल फेंक देंगे। तीन करोड़ रुपये की लागत से आरटीओ भवन बना दिया गया, वह भी उस जमीन पर जो शासन ने रेलवे के लिए प्रस्तावित की थी। संकट मोचन कॉलोनी में तत्कालीन आरआई-पटवारी ने जमीन चिन्हित की, अफसरों ने फाइनल कर दी, पीडब्ल्यूडी ने डीपीआर बना दी और पीआईयू ने इमारत खड़ी कर दी। सात जुलाई 2014 को काम शुरू हुआ, सात अक्टूबर 2015 को पूरा होना था, 30 सितंबर 2016 को पूरा हुआ और छह साल बाद रेलवे ने जब अपनी जमीन पर दूसरी इमारत देखी तो आपत्ति ली। दस साल में यह पता नहीं चल सका कि जिम्मेदार कौन है। यह है असली इंजीनियरिंग।
जमीन का नक्शा बदलना तो मामूली बात है, यहां तो जमीन का मालिक ही बदल दिया गया। रेलवे सोच रही थी, यहां स्टेशन बनेगा और वहां आरटीओ साहब के बैठने की कुर्सी लग गई। इसे कहते हैं दूरदर्शिता। रेल आए न आए, गाड़ी का लाइसेंस तो यहीं मिलेगा।
भोपाल का तीन हजार करोड़ का बायपास—कॉपी-पेस्ट का महाकाव्य। यदि राजगढ़ का किस्सा जमीन पर कब्जे की इंजीनियरिंग थी, तो भोपाल का पश्चिमी बायपास कॉपी-पेस्ट की इंजीनियरिंग का विश्व रिकॉर्ड है। भोपाल रिंग रोड को पूरा करने वाला करीब तीन हजार करोड़ का प्रोजेक्ट, रतनपुर से फंदा तक 36 किलोमीटर लंबा पश्चिमी बायपास। इसकी पर्यावरणीय रिपोर्ट बनाने में जिम्मेदारों ने बड़ी लापरवाही नहीं, बल्कि बड़ी होशियारी दिखाई है। अंग्रेजी की रिपोर्ट में सागर बायपास का उल्लेख है। हिंदी की रिपोर्ट में खर्च की राशि में गड़बड़ी है। हिंदी रिपोर्ट के अनुभाग 1.7 में पर्यावरण संरक्षण के उपाय के लिए अंकों में बजट पांच करोड़ बारह हजार सात सौ बाईस रुपये लिखा है, जबकि शब्दों में चौबीस करोड़ छह लाख दो हजार आठ सौ नब्बे रुपये लिखा गया है। अनुभाग 1.5 में निगरानी कार्य के लिए अंकों में दस लाख चौंसठ हजार रुपये लिखा है। यह कोई गलती नहीं है, यह बहुभाषी इंजीनियरिंग है। एक ही प्रोजेक्ट में दो शहरों का अनुभव—सागर का नाम भोपाल की फाइल में और आंकड़ों में गणित का नया सिद्धांत। अंकों में कुछ और, शब्दों में कुछ और।
यह तो वही कर सकता है, जो रोज नए आयाम स्थापित कर रहा हो। एमपीआरडीसी ने सागर की रिपोर्ट लगाकर भोपाल का बायपास पास करवाने की कोशिश की। सोचिए, कितना आत्मविश्वास है कि सागर और भोपाल की मिट्टी एक ही है, पेड़ एक ही हैं, पर्यावरण एक ही है, फिर अलग रिपोर्ट क्यों बनाना? कॉपी-पेस्ट पर्यावरण बचाने का सबसे सस्ता उपाय है। कागज बचेगा तो पेड़ बचेंगे।
देश ही नहीं, विश्व में चर्चा क्यों? विश्व में चर्चा इसलिए हो रही है, क्योंकि ऐसी इंजीनियरिंग कहीं और नहीं मिलती। दुनिया में इंजीनियर पहले जमीन की जांच करते हैं, फिर नक्शा बनाते हैं, फिर पर्यावरण की रिपोर्ट बनाते हैं और फिर भवन बनाते हैं। मध्यप्रदेश में इंजीनियर पहले भवन बना देते हैं, फिर सोचते हैं कि जमीन किसकी थी और रिपोर्ट तो बाद में कहीं से भी उठाकर लगा देते हैं। यह रिवर्स इंजीनियरिंग नहीं है, यह रिवर्स ऑफ इंजीनियरिंग है, जहां परिणाम पहले तय होता है और कारण बाद में खोजे जाते हैं।
इससे क्या होता है? तीन करोड़ का भवन खंडहर बन जाता है, तीन हजार करोड़ के प्रोजेक्ट पर सवाल उठ जाते हैं और जनता के पैसे का ऐसा उपयोग होता है, जिसे देखकर अर्थशास्त्री भी अपना सिर पकड़ लेते हैं।
नए आयामों का असली अर्थ। रोज नए आयाम स्थापित करने का अर्थ क्या है? खिलचीपुर बायपास का अटकना, क्योंकि नेशनल हाईवे और रेलवे के तालमेल का अभाव था। राजगढ़ में रेलवे की जमीन पर आरटीओ भवन। भोपाल में सागर की रिपोर्ट पर बायपास। हर आयाम में एक ही बात समान है—जिम्मेदार कौन है? दस साल में पता नहीं। फाइलों में सब कुछ ठीक है, जमीन पर सब कुछ उल्टा है।
लोक निर्माण विभाग का काम लोक के लिए निर्माण करना है, पर यहां निर्माण के लिए लोक की जमीन, लोक की पर्यावरण रिपोर्ट और लोक के पैसे का ही ऐसा उपयोग हो रहा है कि लोक ही हैरान है।
इंजीनियरिंग से सबक तक। अजब गजब इंजीनियरिंग से हमें एक सबक मिलता है कि इंजीनियरिंग केवल ईंट और सीमेंट का जोड़ नहीं है, वह जवाबदेही का भी जोड़ है। जब तक राजस्व विभाग, पीडब्ल्यूडी और रेलवे के बीच जमीन का एक ही नक्शा नहीं होगा, तब तक ऐसे ही तीन करोड़ के भवन बनते रहेंगे और जब तक पर्यावरणीय रिपोर्ट को केवल खानापूर्ति समझा जाएगा, तब तक तीन हजार करोड़ के प्रोजेक्ट में भी कॉपी-पेस्ट होता रहेगा।
मध्यप्रदेश में सच में प्रतिभा की कमी नहीं है। यहां के इंजीनियर पुल भी बनाते हैं, सड़कें भी बनाते हैं। पर जब सिस्टम में लापरवाही को इनाम मिलता है और गलती पर दस साल तक कोई जिम्मेदार तय नहीं होता, तो प्रतिभा भी अजब गजब रास्तों पर निकल जाती है। इसलिए विश्व में चर्चा हो रही है—देखो, मध्यप्रदेश में इंजीनियरिंग कैसे होती है, जहां भवन पहले बनता है, जमीन बाद में तय होती है और रिपोर्ट पहले से ही तैयार रहती है। बस शहर का नाम बदलना होता है।
















