नई दिल्ली, 21 सितंबर।
देश में इस बार मानसून ने इतिहास के एक पुराने पन्ने को फिर खोल दिया है। नई दिल्ली से आई मौसम विभाग की रिपोर्ट कहती है कि देश में इस बार दक्षिण-पश्चिमी मानसून 2009 के बाद सबसे कमजोर रहा है। लगातार सत्रह साल में सबसे कम बारिश का रिकॉर्ड दर्ज हुआ है। एक जून से अठारह सितंबर तक देश में कुल सामान्य औसत बारिश 812.1 मिमी है, पर इस साल केवल 691.9 मिमी बारिश हुई है, यानी सामान्य से 15 प्रतिशत कम। यह कमी केवल आंकड़ा नहीं है। यह खेत में खड़ी धान की सूखी कोंपल है, यह बांध में घटा जलस्तर है और यह किसान की आंख में आया आंसू है।
मौसम विभाग के अनुसार अब तक कुल हुई बारिश सामान्य से 15 प्रतिशत कम रही है। अल नीनो के बीच मानसूनी बारिश प्रभावित रही है और औसत का आंकड़ा भी घटकर रह गया है। सत्रह साल में सबसे कमजोर रहने की स्थिति में है। 2009 में देश में मानसून सामान्य से करीब 23 प्रतिशत कम रहा था और उसे बड़े पैमाने के मानसूनी सूखे के रूप में दर्ज किया गया था। इस साल अब तक की 15 प्रतिशत कमी उस स्तर के करीब है। हालांकि मानसून का अंतिम आकलन 30 सितंबर के बाद होगा, पर अभी तक की तस्वीर डराने वाली है।
देश की तस्वीर यदि जिलों के हिसाब से देखें तो चिंता और बढ़ जाती है। देश में 346 जिले ऐसे हैं, जहां बारिश सामान्य से बहुत कम हुई है। इन जिलों में खेतों में दरारें पड़ गई हैं, तालाब सूख गए हैं और बुवाई अधूरी रह गई है। प्रभावित राज्यों में राजस्थान सबसे आगे है, जहां बारिश में 22 प्रतिशत कमी दर्ज हुई है। मध्यप्रदेश में 7 प्रतिशत, छत्तीसगढ़ में 5 प्रतिशत, गुजरात में 8 प्रतिशत और कर्नाटक में 30 प्रतिशत की कमी है।
यह कमी केवल खरीफ की फसल तक सीमित नहीं है। इसका असर आने वाले रबी सीजन पर भी पड़ेगा, क्योंकि बांधों में पानी नहीं होगा और भूजल स्तर नीचे चला जाएगा। खरीफ उत्पादन घटने की आशंका अब केवल आशंका नहीं रही, यह बाजार में दिखने लगी है। दालों और मोटे अनाज के दाम बढ़ने लगे हैं और सरकार को आयात पर विचार करना पड़ रहा है।
एक तरफ देश के बड़े हिस्से में सूखा है, दूसरी तरफ कुछ शहरों में थोड़ी-सी बारिश भी जलभराव बन जाती है। बारिश का वितरण कितना असमान है। कहीं बाढ़ है, कहीं सूखा है और यही असमानता इस साल के मानसून की सबसे बड़ी पहचान बन गई है।
मौसम विभाग कह रहा है कि अब मानसून अपने अंतिम दौर में पहुंच गया है। मौसम विभाग के अनुसार 19 सितंबर से पश्चिमी राजस्थान के कुछ हिस्सों से मानसून की वापसी शुरू हो गई है। सामान्य तौर पर पश्चिमी राजस्थान से वापसी 17 सितंबर के आसपास शुरू होती है, पर इस बार वापसी की प्रक्रिया थोड़ी तेज है। हालांकि वापसी का मतलब पूरे देश में बारिश का तत्काल खत्म होना नहीं है। दक्षिण और पूर्वी भारत में अभी भी बारिश हो सकती है, पर उत्तर और मध्य भारत में अब बड़ी बारिश की उम्मीद कम है।
सत्रह साल में सबसे सूखा मानसून क्यों रहा? इसका सबसे बड़ा कारण अल नीनो को माना जा रहा है। प्रशांत महासागर में पानी गर्म होने से भारत में मानसूनी हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं। इस बार भी अल नीनो सक्रिय रहा और उसने मानसून को आगे नहीं बढ़ने दिया। जुलाई में जो बारिश होनी थी, वह नहीं हुई। अगस्त में जो सक्रियता होनी थी, वह टूट गई।
अल नीनो का असर दो से तीन साल में एक बार होता है, पर अब जलवायु परिवर्तन के कारण यह असर हर साल दिखने लगा है। समुद्र गर्म हो रहा है और मानसून की दिशा बदल रही है। कभी वह बहुत तेज बरसता है तो कभी बिल्कुल नहीं बरसता। यह अति ही अब सामान्य बनती जा रही है।
जब मानसून कमजोर हो तो किसान क्या करे और सरकार क्या करे? किसान के लिए सबसे जरूरी है फसल का बदलाव। यदि बारिश कम है तो धान की जगह मोटा अनाज बोया जाए। ज्वार, बाजरा और रागी जैसी फसलें कम पानी में भी हो जाती हैं और उनका बाजार भी अब बढ़ रहा है। सरकार ने श्री अन्न योजना शुरू की है, पर वह अभी कागज पर ज्यादा है, खेत पर कम।
सरकार के लिए सबसे जरूरी है पानी का प्रबंधन। हर खेत में तालाब, हर गांव में चेकडैम और हर जिले में जल बजट। यदि बारिश का पानी रोक लिया जाए तो सूखे का असर आधा हो जाता है। महाराष्ट्र के कई जिलों में ऐसा प्रयोग सफल भी हुआ है, जहां गांव ने मिलकर पानी रोका और सूखे से लड़ाई जीती।
आज भी फसल बीमा का पैसा समय पर नहीं मिलता। कागज इतने मांगे जाते हैं कि किसान थक जाता है। यदि 346 जिलों में सूखा है तो वहां बीमा का आकलन सैटेलाइट से होना चाहिए, न कि पटवारी की रिपोर्ट से।
सूखा केवल खेत का नहीं, अर्थव्यवस्था का भी है। जब खरीफ उत्पादन घटता है तो केवल किसान गरीब नहीं होता, पूरा देश महंगाई की चपेट में आता है। आटा, दाल, तेल सब महंगा होता है और महंगाई बढ़ने से ब्याज दरें बढ़ती हैं तो उद्योग भी प्रभावित होता है।
2026 का मानसून इसलिए याद रखा जाएगा, क्योंकि इसने हमें फिर याद दिलाया कि हम आज भी बादलों के भरोसे हैं। हमने चांद पर यान भेज दिया, पर बारिश का सटीक अनुमान आज भी नहीं लगा पाते। बादल से ज्यादा जमीन पर ध्यान देना होगा।
सत्रह साल में सबसे सूखा मानसून एक चेतावनी है। यह कह रहा है कि जलवायु बदल रही है और हमें भी बदलना होगा। मानसून की वापसी तो हर साल होती है, पर यदि हमने पानी की वापसी नहीं रोकी तो अगला सूखा और बड़ा होगा।
हम मानसून को केवल मौसम न मानें, उसे अर्थव्यवस्था का पहला बजट मानें और उसी के अनुसार अपनी खेती, अपनी नीति और अपनी आदतें बदलें। तभी 346 जिलों की यह चिंता अगले साल 100 जिलों तक सिमट सकेगी।
















