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संपादकीय
21 Sep, 2026

सड़क पर गोवंश और मौत का साया, अब सींग पर चिप से बचेगी जान, तीन सौ हादसे, सौ मौतें और एक चेतावनी

मध्यप्रदेश में सड़क हादसों में गोवंश से जुड़े खतरे को कम करने के लिए पशुओं की पहचान के लिए माइक्रो चिप और रात में दृश्यता बढ़ाने के लिए रिफ्लेक्टर लगाने की योजना पर काम हो रहा है।

भोपाल, 21 सितंबर।

मध्यप्रदेश की सड़कों पर एक अजीब-सा सन्नाटा पसरा है। दिन में गाय बैठी है और रात में मौत दौड़ती है। शहर हो या गांव, हाईवे हो या गली, हर जगह गोवंश सड़क पर घूमता दिखता है। कुछ चिन्हित क्षेत्रों में तीन सैकड़ा से ज्यादा दुर्घटनाएं हो चुकी हैं और सौ से अधिक आम आदमी की जान जा चुकी है। यह आंकड़ा केवल पुलिस डायरी का नहीं है, यह उस लापरवाही का आंकड़ा है, जो सालों से पाली गई है। गाय को माता कहा जाता है, पर सड़क पर वही माता बेसहारा है। दूध देना बंद करती है तो मालिक छोड़ देता है और वही गाय फिर सड़क पर आकर किसी बाइक सवार की जान ले लेती है या खुद ट्रक के नीचे कुचल जाती है। दोनों तरफ नुकसान है, एक तरफ मानवता और दूसरी तरफ गोवंश।

माइक्रो चिप और रिफ्लेक्टर की नई योजना क्या है

इसी दर्द को रोकने के लिए अब प्रदेश सरकार एक नई योजना पर काम कर रही है। योजना है मवेशियों को व्यवस्थित करने की, उनके सींगों पर माइक्रो चिप और रिफ्लेक्टर लगाने की। माइक्रो चिप का अर्थ है पहचान। हर गोवंश के सींग पर या कान पर एक छोटी-सी चिप लगाई जाएगी। उस चिप में मालिक का नाम, पता और गांव का डेटा होगा। यदि गाय सड़क पर मिलती है तो स्कैनर से तुरंत पता चल जाएगा कि इसका मालिक कौन है। कई बार मालिक जानबूझकर गाय छोड़ देता है, ताकि चारा-पानी का खर्च बचे। अब चिप से वह पकड़ा जाएगा और उस पर जुर्माना लगेगा।

रिफ्लेक्टर का अर्थ है सुरक्षा। रात में हेडलाइट की रोशनी में गाय दिखती नहीं है। काली गाय तो बिल्कुल अंधेरे में घुल जाती है। यदि सींग पर रेडियम रिफ्लेक्टर लगा होगा तो सौ मीटर दूर से ही ड्राइवर को चमक दिखेगी और वह ब्रेक लगा सकेगा। यह छोटा-सा उपाय सौ जानें बचा सकता है। जैसे साइकिल पर रिफ्लेक्टर जान बचाता है, वैसे ही गोवंश पर रिफ्लेक्टर भी जान बचाएगा।

शहरों में सार्वजनिक स्थलों पर गोवंश क्यों बड़ी समस्या है? शहरों में तो समस्या और विकराल है। बस स्टैंड के पास गायें कचरा खा रही हैं, सब्जी मंडी में बैल घूम रहे हैं, अस्पताल के गेट पर मवेशी बैठे हैं। सार्वजनिक स्थलों पर गोबर और गंदगी और उसी के पास से गुजरती तेज रफ्तार गाड़ियां। नगर निगम गाड़ी भेजता है, गायों को पकड़कर कांजी हाउस ले जाता है। मालिक पैसे देकर छुड़ा लाता है और अगले दिन फिर वही गाय उसी चौक पर। यह आंख-मिचौली रोज चलती है। इससे न गोवंश का भला हो रहा है, न शहर का। जरूरत है स्थायी समाधान की।

गोवंश को सड़क से हटाकर गौशाला तक ले जाना ही उपाय नहीं है। गौशाला भी तो भरी पड़ी हैं, चारे के बिना गायें वहां भी मर रही हैं। इसलिए चिप और रिफ्लेक्टर के साथ-साथ गौशालाओं को आत्मनिर्भर बनाना भी जरूरी है। जहां गोबर से गैस बने, गोमूत्र से दवा बने और गौशाला खुद कमा सके।

दुर्घटना केवल एक्सीडेंट नहीं, सिस्टम की विफलता है। तीन सौ से ज्यादा दुर्घटनाएं बताती हैं कि यह इत्तेफाक नहीं है। यह सिस्टम की विफलता है। हमने सड़कें चौड़ी कर दीं, पर गायों के लिए कोई कॉरिडोर नहीं बनाया। हमने स्ट्रीट लाइट लगा दीं, पर रिफ्लेक्टर नहीं लगाया। हमने हेलमेट अनिवार्य कर दिया, पर गोवंश को सड़क से हटाना अनिवार्य नहीं किया। रात में जब बाइक सवार सत्तर की स्पीड में होता है और अचानक बीच सड़क पर गाय आ जाती है तो हेलमेट भी जान नहीं बचाता, क्योंकि टक्कर सीधी होती है और गाय का वजन तीन सौ किलो से ज्यादा होता है। ऐसे में बाइक सवार उछलकर दूर गिरता है और सिर में चोट से मौत हो जाती है। सौ से अधिक मौतें इसी तरह हुई हैं।

गोवंश सड़क पर क्यों आता है? क्योंकि मालिक उसे छोड़ देता है और समाज उसे पालने को तैयार नहीं है। पुराने समय में हर गांव में गोचर भूमि होती थी। गायें वहीं चरती थीं। अब गोचर पर अतिक्रमण हो गया है, प्लॉट कट गए हैं, तो गाय कहां जाए? वह सड़क पर ही आएगी। इसलिए योजना केवल चिप लगाने की नहीं होनी चाहिए, योजना गोचर को बचाने की भी होनी चाहिए। हर पंचायत में एक व्यवस्थित चारागाह हो, हर शहर में एक बड़ी गौशाला हो, जहां बेसहारा गोवंश को रखा जाए और उस गौशाला को सरकार नहीं, समाज चलाए। यदि मालिक अपनी गाय को छोड़ता है तो उस पर केवल जुर्माना नहीं, उसे गौशाला में एक महीने सेवा भी करनी चाहिए। तभी उसे समझ आएगा कि गाय पालना कितना कठिन है।

माइक्रो चिप तकनीक है, रिफ्लेक्टर सुरक्षा है, पर इन दोनों के पीछे करुणा होनी चाहिए। गाय को केवल समस्या मत समझिए। वह हमारी अर्थव्यवस्था का हिस्सा है। उसके गोबर से खेत उपजाऊ होता है, उसके होने से गांव में समृद्धि आती है। जब हम उसके सींग पर चिप लगाएं तो इस भाव से लगाएं कि हम उसकी रक्षा कर रहे हैं, न कि केवल अपनी जान बचा रहे हैं। जब हम रिफ्लेक्टर लगाएं तो इस भाव से लगाएं कि रात में कोई ट्रक उसे कुचल न दे।

मध्यप्रदेश यदि इस योजना को ईमानदारी से लागू करता है तो यह देश के लिए मॉडल बन सकता है। तीन सौ हादसे रुक सकते हैं, सौ जानें बच सकती हैं और गोवंश भी सुरक्षित हो सकता है। सड़कें इंसानों के लिए हैं, पर धरती सबकी है। यदि इंसान और गोवंश दोनों को साथ चलना है तो तकनीक और करुणा को भी साथ चलना होगा। सींग पर लगा छोटा-सा रिफ्लेक्टर इसी सा

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