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संपादकीय
21 Sep, 2026

अमेरिका में मिड टर्म चुनाव और व्हाइट हाउस का सेमीफाइनल

अमेरिका के 2026 मध्यावधि चुनाव में महंगाई, शुल्क नीति, आव्रजन, स्वास्थ्य बीमा और ट्रंप प्रशासन की नीतियां प्रमुख मुद्दे हैं, जिनके बीच कांग्रेस के दोनों सदनों के समीकरण पर सबकी नजर है।

वाशिंगटन, 21 सितंबर।

अमेरिका में राष्ट्रपति का कार्यकाल चार साल का होता है, पर बीच में दो साल बाद एक चुनाव और होता है। उसे मिड टर्म कहते हैं। इसमें पूरे हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स की 435 सीटें, सीनेट की 100 में से 35 सीटें और 36 राज्यों के गवर्नर चुने जाते हैं। यह चुनाव राष्ट्रपति के काम का पहला रिपोर्ट कार्ड होता है। यदि जनता खुश है तो उसी पार्टी को संसद में बनाए रखती है, यदि नाराज है तो विरोधी पार्टी को जिता देती है। इसलिए इसे सेमीफाइनल भी कहा जाता है। 2026 का मिड टर्म इस लिहाज से और खास है, क्योंकि इस समय व्हाइट हाउस में डोनाल्ड ट्रंप दूसरी बार राष्ट्रपति हैं और उनका एजेंडा बहुत आक्रामक है। टैरिफ की लड़ाई, इमिग्रेशन पर सख्ती और यूक्रेन व गाजा पर बदली नीति, इन सबका असर अमेरिकी वोटर पर पड़ रहा है। मिड टर्म तय करेगा कि ट्रंप अगले दो साल राजा की तरह चलेंगे या कांग्रेस में बंध जाएंगे।

अमेरिका में इस बार सबसे बड़ा मुद्दा महंगाई है। राष्ट्रपति ने चीन, मेक्सिको और यूरोप पर भारी टैरिफ लगा दिया है। इससे अमेरिकी बाजार में सामान महंगा हो गया है। कहा गया था कि टैरिफ से अमेरिकी फैक्ट्री वापस आएगी, पर हकीकत में अभी तक कीमत ही बढ़ी है। ग्रॉसरी से लेकर कार तक सब महंगा है। मध्यम वर्ग का वोटर पूछ रहा है कि क्या यही अमेरिका फर्स्ट है। रिपब्लिकन पार्टी कह रही है कि थोड़ा दर्द सहो, लंबे समय में फायदा होगा और बॉर्डर सुरक्षित हुआ है। डेमोक्रेट कह रहे हैं कि यह टैक्स अमेरिकी जनता पर ही है और इससे नौकरियां नहीं बढ़ रही हैं। यही बहस इस मिड टर्म का केंद्र बन गई है। पेट्रोल के दाम, ब्याज दर और हेल्थ इंश्योरेंस का प्रीमियम, इन तीन चीजों पर वोटर फैसला करेगा।

पिछले दो साल से हाउस और सीनेट दोनों में रिपब्लिकन का कब्जा है। इसलिए ट्रंप को कानून पास कराने में आसानी रही। पर मिड टर्म में इतिहास कहता है कि सत्ता वाली पार्टी हारती है। 1946 से अब तक लगभग हर मिड टर्म में व्हाइट हाउस वाली पार्टी ने सीटें गंवाई हैं। इस बार हाउस में लड़ाई सबसे तेज है। डेमोक्रेट को केवल पांच सीटें और चाहिए बहुमत के लिए। वे उपनगरीय महिलाओं और युवा वोटरों पर फोकस कर रहे हैं। उनका नारा है कि लोकतंत्र बचाना है और एबॉर्शन के अधिकार को वापस लाना है। सीनेट में नक्शा रिपब्लिकन के लिए आसान है, क्योंकि जिन 35 सीटों पर चुनाव है, उनमें से अधिकांश पहले से ही रिपब्लिकन राज्यों में हैं। पर यदि डेमोक्रेट दो या तीन सीट भी पलट देते हैं तो सीनेट में बराबरी आ जाएगी और उपराष्ट्रपति के वोट से फैसला होगा।

अमेरिका में बसा भारतीय समुदाय अब बड़ा वोट बैंक बन गया है। टेक्सास, कैलिफोर्निया और न्यू जर्सी में भारतीय वोटर निर्णायक हैं। इस बार एच-1बी वीजा पर सख्ती और छात्रों पर निगरानी से भारतीय समुदाय नाराज है। डेमोक्रेट इसे मुद्दा बना रहे हैं कि प्रतिभा को रोका जा रहा है। रिपब्लिकन कह रहे हैं कि अमेरिकी नौकरी पहले है। इसका असर स्विंग जिलों में दिख सकता है।

दुनिया के लिए यह मिड टर्म बहुत अहम है। यदि रिपब्लिकन जीतते हैं तो ट्रंप की टैरिफ नीति और मजबूत होगी। भारत जैसे देशों पर भी दबाव बढ़ेगा। अमेरिका से ज्यादा खरीदो। यदि डेमोक्रेट हाउस जीत लेते हैं तो ट्रंप की विदेश नीति पर ब्रेक लगेगा। कांग्रेस यूक्रेन को मदद के लिए फिर दबाव बनाएगी और टैरिफ पर सुनवाई शुरू होगी।

2026 के चुनाव में प्रचार का तरीका भी बदल गया है। अब टीवी विज्ञापन से ज्यादा टिकटॉक, रील और एआई वीडियो चल रहे हैं। दोनों पार्टियां एआई से वोटर का चेहरा पहचानकर उसे उसी की भाषा में संदेश भेज रही हैं। कहीं डीपफेक का डर भी है कि किसी उम्मीदवार का नकली वीडियो वायरल हो जाए। इसलिए इस बार चुनाव आयोग ने एआई लेबलिंग अनिवार्य की है।

युवा वोटर अब परंपरागत रैली में नहीं आता। वह इंस्टाग्राम पर सवाल पूछता है कि क्लाइमेट पर तुम्हारी नीति क्या है, कि स्टूडेंट लोन माफ होगा या नहीं। जो पार्टी इस भाषा को समझेगी, वही जीतेगी।

मिड टर्म का परिणाम चाहे जो भी हो, एक बात तय है कि अमेरिका और ज्यादा बंट जाएगा। शहर और गांव के बीच, युवा और बुजुर्ग के बीच, टेक कंपनियों और मजदूरों के बीच। यह बंटवारा ही अमेरिकी राजनीति की नई हकीकत है। भारत के लिए इसमें सबक है। अमेरिका में सत्ता में बैठी पार्टी भी हर दो साल में जनता के सामने जाती है और जनता उसे सजा या इनाम देती है। यह जवाबदेही ही लोकतंत्र को जिंदा रखती है।

2026 का मिड टर्म केवल अमेरिका का चुनाव नहीं है। यह तय करेगा कि दुनिया में संरक्षणवाद बढ़ेगा या उदारवाद लौटेगा, कि डॉलर महंगा रहेगा या सस्ता होगा और कि आने वाले राष्ट्रपति चुनाव में ट्रंप तीसरी बार लड़ने की बात कितनी गंभीरता से ले पाएंगे। व्हाइट हाउस का रास्ता इस बार वाशिंगटन से नहीं, ओहायो, पेंसिल्वेनिया और एरिजोना के उन छोटे कस्बों से होकर गुजरेगा, जहां वोटर अभी भी तय नहीं कर पाया है कि जेब बड़ी है या नारा बड़ा है।

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