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संपादकीय
21 Sep, 2026

पाकिस्तान में बारूद की आंधी और चीन के सपने पर लगती चोट

पाकिस्तान में टीटीपी और बीएलए के बढ़ते हमलों के बीच चीनी नागरिकों और सीपेक परियोजनाओं की सुरक्षा चुनौती बनी हुई है, जिससे चीन के निवेश और परियोजनाओं की रफ्तार पर असर पड़ रहा है।

इस्लामाबाद, 21 सितंबर।

पाकिस्तान इन दिनों अपने ही बनाए जाल में फंसता दिख रहा है। खैबर पख्तूनख्वा से लेकर बलूचिस्तान तक हर रोज कोई न कोई बड़ा हमला हो रहा है। तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान, जिसे टीटीपी कहते हैं, और बलूच लिबरेशन आर्मी, जिसे बीएलए कहते हैं, दोनों संगठन एक साथ सक्रिय हो गए हैं। पहले टीटीपी केवल सेना को निशाना बनाता था, अब बीएलए चीनी नागरिकों और चीनी परियोजनाओं को निशाना बना रहा है। पिछले कुछ महीनों में दर्जनों आत्मघाती हमले हुए हैं। सुरक्षा चौकियों पर हमले, स्कूलों पर हमले और ग्वादर पोर्ट के पास काफिले पर हमले। इससे पाकिस्तान की सेना की साख भी गिरी है और आम पाकिस्तानी में डर भी बढ़ा है।

पाकिस्तान ने दशकों तक आतंक को अपनी विदेश नीति का हथियार बनाया था। अब वही हथियार उसी पर पलटवार कर रहा है। अफगानिस्तान में तालिबान की वापसी के बाद टीटीपी को खुली पनाह मिली है, हथियार मिले हैं और ट्रेनिंग भी मिली है। बलूचिस्तान में अलगाव की भावना पहले से थी, पर अब उसमें चीन के खिलाफ गुस्सा भी जुड़ गया है। बलूच लोग मानते हैं कि उनके संसाधन लूटे जा रहे हैं और बदले में उन्हें नौकरी तक नहीं मिल रही है। इसलिए वे चीनी इंजीनियरों को निशाना बना रहे हैं।

चीन और पाकिस्तान की दोस्ती की सबसे बड़ी निशानी है चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर, जिसे सीपेक कहते हैं। यह करीब 62 अरब डॉलर का प्रोजेक्ट है। ग्वादर पोर्ट से लेकर काशगर तक सड़क, रेल और ऊर्जा परियोजनाएं। चीन इसे अपनी बेल्ट एंड रोड योजना का दिल मानता है। पर पिछले एक साल में इस प्रोजेक्ट पर पांच बड़े हमले हुए हैं। कराची यूनिवर्सिटी में चीनी शिक्षकों पर हमला, ग्वादर में चीनी काफिले पर आत्मघाती हमला और दासू डैम पर इंजीनियरों की बस पर हमला। इन हमलों में दर्जनों चीनी नागरिक मारे गए हैं।

चीन अब खुलकर नाराजगी जता रहा है। बीजिंग ने इस्लामाबाद से कहा है कि यदि सुरक्षा नहीं दे सकते तो हम अपनी निजी सुरक्षा भेजेंगे। यह पाकिस्तान की संप्रभुता पर सीधा सवाल है।

सीपेक की रफ्तार अब धीमी हो गई है। कई ऊर्जा प्रोजेक्ट अधूरे हैं। ग्वादर पोर्ट पर काम रुक-सा गया है। चीनी कंपनियां अब पाकिस्तान में नया निवेश करने से डर रही हैं। पहले सुरक्षा दो, फिर पैसा लगेगा। पर पाकिस्तान की सेना खुद ही कई मोर्चों पर उलझी है। वह चीनी नागरिकों को भी नहीं बचा पा रही।

चीन के पास पाकिस्तान से निकलने का आसान रास्ता नहीं है। उसने बहुत पैसा लगा दिया है। यदि वह पीछे हटता है तो उसकी पूरी बेल्ट एंड रोड योजना पर सवाल उठेगा। दुनिया कहेगी कि चीन अपने दोस्त को भी सुरक्षित नहीं रख पाया और यदि वह रहता है तो हर महीने लाशें गिननी पड़ेंगी। चीन की रणनीति में पाकिस्तान एक अहम कड़ी है, भारत को घेरने के लिए और अरब सागर तक सीधा रास्ता पाने के लिए।

पर बलूचिस्तान में जमीन पर विरोध इतना तेज है कि सड़क बनाना भी युद्ध जैसा हो गया है। चीनी मजदूर अब बंकर में रहते हैं और बिना सेना के काफिले के बाहर नहीं निकलते। यह विकास नहीं है, यह सैन्य कब्जे जैसा दिखता है।

पाकिस्तान में आतंक का बढ़ना केवल दक्षिण एशिया की समस्या नहीं है। यह विश्व स्तर पर असर डाल रहा है। निवेश पर जब परमाणु हथियार वाला देश अस्थिर होता है तो पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था डरती है। आईएमएफ पहले ही पाकिस्तान को कर्ज देने में हिचक रहा है और अब चीन भी हाथ खींच रहा है तो पाकिस्तान दिवालिया होने की कगार पर है।

आतंक के निर्यात पर जब टीटीपी मजबूत होता है तो उसका असर अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक जाता है और जब बीएलए मजबूत होता है तो ईरान तक तनाव बढ़ता है। अमेरिका पहले ही कह चुका है कि पाकिस्तान आतंक का एपिसेंटर है। अब चीन भी वही भाषा बोलने लगा है। यह बड़ा बदलाव है।

बेल्ट एंड रोड पर यदि सीपेक फेल होता है तो चीन की पूरी योजना फेल मानी जाएगी। श्रीलंका में पहले ही हंबनटोटा का अनुभव खराब रहा। अब पाकिस्तान में भी वही कहानी दोहराई जा रही है। दुनिया के छोटे देश अब चीन से कर्ज लेने से पहले सौ बार सोचेंगे।

भारत के लिए इसमें दो सबक हैं। आतंक को पालना आखिर में खुद को ही खाता है और दूसरा यह कि बलूचिस्तान में जो हो रहा है, वह मानवाधिकार का मुद्दा भी है। भारत को चाहिए कि वह विश्व मंच पर बलूच लोगों की आवाज को शांति से उठाए और साथ ही अपनी सीमा पर सुरक्षा और मजबूत करे, क्योंकि जब पाकिस्तान अंदर से टूटता है तो वह बाहर हमला करने की कोशिश करता है।

पाकिस्तान को अब तय करना होगा कि उसे बंदूक चाहिए या रोटी। यदि वह आज भी आतंकी संगठनों में फर्क करता रहा कि यह अच्छा आतंकी है और यह बुरा आतंकी है, तो यह आग और फैलेगी। उसे अपने ही लोगों, बलूच और पश्तूनों को बातचीत से जोड़ना होगा।

और चीन को भी समझना होगा कि पैसा फेंकने से दिल नहीं जीते जाते। चीन के लिए भी यह परीक्षा है। क्या वह केवल पैसा लगाएगा या लोगों का विकास भी करेगा? यदि ग्वादर के मछुआरों को ही रोजगार नहीं मिलेगा तो वे बंदरगाह को जलाएंगे ही। विकास बंदूक के साये में नहीं होता, विकास भरोसे में होता है। बारूद पर बना कॉरिडोर ज्यादा दिन नहीं चलता।

पाकिस्तान में हुए हमले बता रहे हैं कि नक्शे पर लकीर खींचना आसान है, पर जमीन पर उसे बनाना मुश्किल है। जब तक स्थानीय लोगों का भरोसा नहीं होगा, तब तक कोई भी प्रोजेक्ट, चाहे वह 62 अरब डॉलर का ही क्यों न हो, सुरक्षित नहीं रहेगा। सीपेक आज इसी मोड़ पर खड़ा है। एक तरफ चीन का पैसा है, दूसरी तरफ बलूच का गुस्सा और टीटीपी की गोली और बीच में फंसा है पाकिस्तान, जो खुद नहीं जानता कि वह किस तरफ जाए।

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