नई दिल्ली, 22 सितंबर।
लोकतंत्र में मतदाता सूची महज नामों की सूची नहीं, बल्कि नागरिक के मतदान अधिकार का आधार है। इसलिए दिल्ली में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान 33 लाख से अधिक मतदाताओं को नोटिस मिलना गंभीरता से देखने की जरूरत है। निर्वाचन आयोग के अनुसार नाम, अभिभावक संबंधी विवरण अथवा पिछली मतदाता सूची से रिकॉर्ड का मिलान न होने जैसी विसंगतियां इसके पीछे कारण हैं। नोटिस मिलना अपने आप में नाम हटाए जाने का अर्थ नहीं है।
मतदाता सूची से मृत, स्थानांतरित या दोहरी प्रविष्टियां हटाना जरूरी है, लेकिन किसी वास्तविक मतदाता का नाम केवल तकनीकी त्रुटि के कारण प्रभावित न हो, यह उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है। उल्लेखनीय है कि नोटिस पाने वालों में लालकृष्ण आडवाणी, एस. जयशंकर, जगदीप धनखड़ और कई वरिष्ठ अधिकारी भी शामिल हैं। निर्वाचन आयुक्त एस.एस. संधू का नाम भी विसंगति के कारण चिह्नित हुआ।
सवाल यह है कि लाखों मतदाताओं को नोटिस जारी करने वाली प्रक्रिया कितनी पारदर्शी और नागरिकों के लिए कितनी सरल है? प्रत्येक मतदाता को यह स्पष्ट जानकारी मिलनी चाहिए कि उसके रिकॉर्ड में क्या कमी पाई गई और उसे दूर करने के लिए कौन-से दस्तावेज चाहिए। आपत्ति और सुनवाई की प्रक्रिया भी सहज होनी चाहिए।
मतदाता सूची की शुद्धता चुनाव की विश्वसनीयता के लिए अनिवार्य है, लेकिन शुद्धता और समावेशन दोनों साथ चलने चाहिए। एक गलत नाम का बने रहना चिंता का विषय है, तो एक वास्तविक मतदाता का नाम छूट जाना भी उतना ही गंभीर है। एसआईआर की सफलता केवल हटाए गए नामों की संख्या से नहीं, बल्कि इस बात से तय होगी कि अंतिम सूची में प्रत्येक पात्र नागरिक का मतदान अधिकार सुरक्षित रहा या नहीं।















