वैश्विक स्तर पर ऊर्जा आपूर्ति में आई बाधाओं और गैस बाजार की अस्थिरता के कारण उर्वरक उत्पादन प्रभावित होने से खाद्य सुरक्षा पर बढ़ते खतरे को देखते हुए गैस नीति में व्यावहारिक और संतुलित पुनर्विचार की आवश्यकता पर जोर दिया गया है।
06 मई।
दुनिया इस समय एक ऐसे दोहरे संकट की दहलीज पर खड़ी है, जहां ऊर्जा आपूर्ति में बाधा सीधे खाद्य सुरक्षा को प्रभावित कर रही है। होरमुज जलडमरूमध्य में अवरोध ने न केवल तेल और गैस की आपूर्ति को बाधित किया है, बल्कि उर्वरक उत्पादन पर भी गंभीर असर डाला है। वैश्विक स्तर पर व्यापार होने वाले उर्वरकों का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से गुजरता है। यूरिया, पोटाश और फॉस्फेट आधारित उर्वरकों के साथ-साथ सल्फर की आपूर्ति भी प्रभावित हुई है, जिससे कृषि उत्पादन पर दबाव बढ़ना तय है।
उर्वरक उत्पादन में प्राकृतिक गैस की अहम भूमिका होती है, विशेष रूप से यूरिया के निर्माण में। जब गैस की उपलब्धता घटती है, तो उर्वरक उत्पादन महंगा और सीमित हो जाता है। इसका सीधा असर खाद्य उत्पादन और कीमतों पर पड़ता है। आयात पर निर्भर देशों के लिए यह स्थिति और अधिक चिंताजनक है, क्योंकि इससे भूख और महंगाई दोनों का खतरा बढ़ता है। ऊर्जा और खाद्य जैसे आवश्यक क्षेत्रों में आपूर्ति का झटका व्यापक आर्थिक अस्थिरता को जन्म दे सकता है।
वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में तेल और गैस की कीमतों में अलग-अलग रुझान देखने को मिले हैं। जहां कच्चे तेल की कीमतों में तेज वृद्धि हुई है, वहीं गैस बाजार अपेक्षाकृत स्थिर रहा है। इसका एक बड़ा कारण यह है कि गैस का व्यापार भौगोलिक सीमाओं और पाइपलाइन नेटवर्क पर अधिक निर्भर करता है। यूरोप ने हाल के वर्षों में रूस से पाइपलाइन गैस की आपूर्ति कम कर दी और एलएनजी आयात पर निर्भरता बढ़ाई। लेकिन मौजूदा संकट में यह रणनीति महंगी और अस्थिर साबित हो रही है।
ऐसे में एक व्यावहारिक समाधान यह हो सकता है कि यूरोप रूस से पाइपलाइन गैस की खरीद फिर से शुरू करे। इससे एलएनजी पर उसकी निर्भरता घटेगी और वैश्विक बाजार में एलएनजी की उपलब्धता बढ़ेगी। इसका लाभ उन देशों को मिलेगा जो उर्वरक उत्पादन के लिए गैस पर निर्भर हैं। यदि गैस सस्ती और सुलभ होगी, तो उर्वरक उत्पादन बढ़ेगा और खाद्य संकट की आशंका को कम किया जा सकेगा।
यह केवल आर्थिक निर्णय नहीं, बल्कि एक व्यापक मानवीय आवश्यकता भी है। यदि समय रहते उचित कदम नहीं उठाए गए, तो खाद्य संकट वैश्विक अस्थिरता को और गहरा सकता है। इसलिए ऊर्जा नीति में लचीलापन और व्यावहारिकता अपनाना आवश्यक है। यूरोप सहित वैश्विक शक्तियों को यह समझना होगा कि भू-राजनीतिक निर्णयों का प्रभाव केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी दुनिया की खाद्य सुरक्षा को प्रभावित करता है।