संपादकीय
08 Jul, 2026

सौ साल का इंतजार और आस्था की जीत: खुले मंदिर के कपाट तो छलक पड़े आंसू

कर्नाटक के निदघट्टा गांव में करीब सौ साल बाद श्री आंजनेयरस्वामी मंदिर के कपाट दलित समुदाय के लिए खुले और लोगों ने भावुक होकर भगवान के दर्शन किए।

चिक्कमंगलूर, 08 जुलाई।

समरसता की दिशा में बढ़ा यह कदम मंदिर की चौखट पर खत्म हुए एक सदी के इंतजार की कहानी है। यह सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि उस भारत की धड़कन है जिसे हम अक्सर भूल जाते हैं। कर्नाटक के चिक्कमंगलूर जिले के निदघट्टा गांव स्थित श्री आंजनेयरस्वामी मंदिर के दरवाजे करीब 100 साल बाद दलित समुदाय के लिए खुल गए। क्षेत्र की परंपरा के अनुसार मंदिर में दलित समुदाय के प्रवेश पर प्रतिबंध था। वे मंदिर के बाहर से ही सिर झुकाते, हाथ जोड़ते और लौट जाते थे। अब वे मंदिर में प्रवेश कर भगवान के दर्शन और आशीर्वाद प्राप्त कर सकेंगे।

पहली बार मंदिर में जाकर प्रार्थना करते हुए दलित समुदाय के कई लोगों की आंखें भर आईं। यह आंसू केवल खुशी के नहीं थे, बल्कि सौ साल के अपमान, पीढ़ियों के इंतजार और टूटती सामाजिक बेड़ियों के भी थे। यह घटना हमें आईना दिखाती है। हम चांद पर पहुंच गए, कृत्रिम बुद्धिमत्ता विकसित कर रहे हैं, लेकिन अपने ही देश में अपने ही लोगों को भगवान के घर से दूर रखते रहे। यह कैसी विडंबना है?

मंदिर वह स्थान है जहां सब समान होते हैं, जहां जाति नहीं, केवल भक्ति का महत्व होता है। लेकिन हमने मंदिरों को भी भेदभाव का प्रतीक बना दिया। उस बच्चे के बारे में सोचिए जो हर बार मंदिर के बाहर से लौटकर पूछता था, "हम अंदर क्यों नहीं जा सकते?" उस मां के बारे में सोचिए जो अपनी मन्नत लेकर मंदिर तक आती थी, लेकिन देहरी नहीं लांघ पाती थी। यह प्रतिबंध केवल पत्थर की दीवार का नहीं, बल्कि मन की दीवार का था, और मन की दीवार सबसे कठिन होती है।

अब यह दीवार टूटी है। पुलिस प्रशासन, सामाजिक कार्यकर्ताओं और गांव के समझदार लोगों के प्रयासों से यह संभव हो सका। जिला प्रशासन ने शांति बनाए रखने के लिए पर्याप्त पुलिस बल तैनात किया, लेकिन असली जीत पुलिस की नहीं, बल्कि बदली हुई सोच की है। गांव के लोगों ने स्वीकार किया कि गलती हुई थी और अब उसे सुधारना जरूरी है। यह केवल मंदिर का द्वार खुलने की घटना नहीं, बल्कि समाज के लिए नई राह का संकेत है। यह बताती है कि बदलाव देर से सही, लेकिन आता जरूर है। इसके लिए साहस, पहल और संवाद की आवश्यकता होती है।

इस घटना से तीन महत्वपूर्ण सीख मिलती हैं। पहली, आस्था पर किसी एक वर्ग का अधिकार नहीं है। भगवान सबके हैं और मंदिर भी सबके हैं। दूसरी, परंपरा के नाम पर अन्याय को ढोना धर्म नहीं है। धर्म वह है जो जोड़ता है, तोड़ता नहीं। तीसरी, बदलाव के लिए केवल कानून नहीं, बल्कि समाज की इच्छा भी जरूरी है। संविधान का अनुच्छेद 17 छुआछूत को समाप्त करता है, लेकिन कानून तभी प्रभावी होता है जब समाज उसे स्वीकार करे।

निदघट्टा गांव ने पूरे देश को संदेश दिया है कि यदि नीयत साफ हो तो सौ साल पुरानी बेड़ियां भी टूट सकती हैं। अब हमें अपने आसपास भी देखना होगा कि कहीं हमारे गांव, शहर या मन में ऐसी कोई अदृश्य दीवार तो नहीं, जिसे हम परंपरा के नाम पर ढो रहे हैं। मंदिर में छलके वे आंसू शिकायत के नहीं, बल्कि सम्मान और स्वीकार्यता के थे। अब समय है कि हर भेदभाव की दीवार गिरे, ताकि हर भारतीय बिना किसी भय या भेदभाव के ईश्वर के सामने सिर झुका सके। यही सच्ची पूजा, सच्चा धर्म और वास्तविक सामाजिक समरसता है।

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