नई दिल्ली, 08 जुलाई।
हरियाणा से कांग्रेस के नवनिर्वाचित राज्यसभा सदस्य कर्मवीर सिंह बौद्ध ने कहा है कि उनका संसद पहुंचना महज एक राजनीतिक कामयाबी नहीं है। इसे वे सामाजिक न्याय, संवैधानिक मूल्यों की रक्षा और शोषितों के हक की आवाज बुलंद करने के एक बड़े मौके के रूप में देखते हैं।
आगामी मानसून सत्र के दौरान सदन में यह उनका पहला अनुभव होगा। इस दौरान वे सफाई कर्मियों की बदहाली, दलितों और आदिवासियों पर होने वाले उत्पीड़न, किसान समस्याओं, युवा रोजगार, शिक्षा और देश के संविधान से जुड़े गंभीर विषयों को पूरी मजबूती के साथ उठाएंगे।
एक विशेष बातचीत में कर्मवीर बौद्ध ने उच्च सदन के चुनाव के दौरान उपजे घटनाक्रम, सामाजिक न्याय की नीतियों, कृषि संकट, रोजगार के अवसरों, अग्निवीर योजना, प्रस्तावित संविधान संशोधनों, नए परिसीमन, राम मंदिर के चढ़ावे की चोरी और नीट परीक्षा के पेपर लीक जैसे ज्वलंत विषयों पर विस्तार से चर्चा की।
कांटे के मुकाबले में मिली अपनी कामयाबी को उन्होंने लोकतंत्र तथा संविधान के प्रति जनता के विश्वास की जीत बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस के पास पर्याप्त संख्या बल होने के बावजूद चुनाव के वक्त डर और संशय का माहौल तैयार किया गया था, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए ठीक नहीं है।
अपने पूर्व प्रशासनिक अनुभव का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि वे सरकारी तंत्र की कमियों को भली-भांति समझते हैं। उनके अनुसार, सामाजिक न्याय के लिए कागजों पर तो कड़े कानून मौजूद हैं, परंतु धरातल पर क्रियान्वयन के स्तर पर कई गंभीर खामियां साफ नजर आती हैं।
सांसद ने कहा कि उनकी प्राथमिकता आउटसोर्सिंग व्यवस्था के कारण असुरक्षित हुए सफाई कर्मचारियों के हक में आवाज उठाने की रहेगी। इसके अतिरिक्त, वे अत्याचार निवारण अधिनियम को और अधिक कड़ाई से लागू करवाने की मांग करेंगे, ताकि पीड़ितों को वक्त पर सही इंसाफ मिल सके।
संविधान संशोधन और परिसीमन के मोर्चे पर उन्होंने स्पष्ट किया कि कांग्रेस ऐसे किसी भी कदम का डटकर मुकाबला करेगी जो देश के लोकतांत्रिक ढांचे को नुकसान पहुंचाए। उन्होंने कहा कि दबाव की राजनीति के इस दौर में कांग्रेस लोकतांत्रिक संस्थाओं की रक्षा के लिए संसद में पूरी ताकत से खड़ी रहेगी।
कृषक परिवार से ताल्लुक रखने वाले बौद्ध ने जोर देकर कहा कि न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) और कृषि लागत जैसे बुनियादी सवाल आज भी अनसुलझे हैं। किसानों से किए गए वादे अधूरे हैं और वे अन्नदाताओं के अधिकारों से जुड़े इन मुद्दों को सदन में निरंतर उठाते रहेंगे।
















