वॉशिंगटन, 08 जुलाई।
दुनिया ने राजनीति में तानाशाही देखी है, व्यापार में धौंस देखी है और तेल के सौदों में दबाव की राजनीति भी देखी है। अब खेल के मैदान में भी वही पुराना नुस्खा दिखाई देने लगा है—नियम मैं बनाऊंगा, रेफरी मैं तय करूंगा, ट्रॉफी भी मेरी होगी और ताली भी मैं ही बजवाऊंगा। जब सत्ता का अहंकार बढ़ता है तो स्टेडियम भी सत्ता प्रदर्शन का मंच बन जाता है और स्वर्ण पदक भी प्रतिष्ठा के बजाय प्रभुत्व का प्रतीक बन जाता है।
कुछ समय पहले तक दावा किया जा रहा था कि विश्व शांति इन्हीं के कारण कायम है और नोबेल पुरस्कार का सबसे बड़ा हकदार भी वही हैं। दुनिया ने इन दावों पर मुस्कुराकर प्रतिक्रिया दी, लेकिन उस मुस्कान के पीछे चिंता भी थी। जब कोई व्यक्ति या देश हर मंच पर स्वयं को नायक घोषित करने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि अगला लक्ष्य किसी और का नहीं, पूरी व्यवस्था का है। अब वही तेवर खेलों में भी दिखाई दे रहे हैं। फीफा विश्व कप के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति का मैदान में उतरना, रेफरी को रेड कार्ड दिखाने की मुद्रा बनाना और कैमरों के सामने ट्रॉफी को इस तरह लहराना, मानो वह निजी संपत्ति हो, खेल भावना का प्रदर्शन नहीं, बल्कि शक्ति का संदेश था।
खेलों में राजनीति का दखल नया नहीं है, लेकिन राजनीति द्वारा खेलों को अपने प्रभाव का माध्यम बना लेना निश्चित रूप से चिंताजनक है। पहले ऊर्जा बाजारों में दबाव बनाया गया, फिर कूटनीति में मध्यस्थता का श्रेय लेने की होड़ लगी और अब खेल भी उसी प्रभाव की परिधि में आते दिखाई दे रहे हैं। मेजबानी, प्रायोजन, प्रसारण अधिकार और वैश्विक प्रभाव—सब कुछ कुछ शक्तिशाली देशों के इर्द-गिर्द सिमटता जा रहा है। प्रतियोगिता का उद्देश्य निष्पक्ष मुकाबला होना चाहिए, न कि प्रभाव और संसाधनों की ताकत का प्रदर्शन।
कल्पना कीजिए कि यदि कोई आयोजक देश यह कहने लगे कि निर्णायक हमारे होंगे, नियम हमारी सुविधा के अनुसार बदलेंगे, डोपिंग जांच हमारी शर्तों पर होगी और विवाद होने पर अंतिम फैसला भी हमारा ही होगा, तो खेल की आत्मा का क्या होगा? आज यह कल्पना लग सकती है, लेकिन यदि संस्थाएं निष्पक्ष न रहीं तो कल यह वास्तविकता भी बन सकती है। जिस व्यवस्था में हर चीज को सौदे की नजर से देखा जाए, वहां खेल भी एक सौदा बनकर रह जाएगा।
खेल की असली ताकत बराबरी, परिश्रम और निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा में है। जब कोई ताकतवर देश मैदान में भी विशेष अधिकार चाहता है, तो बराबरी की भावना कमजोर पड़ने लगती है। फिर ओलंपिक और विश्व कप वैश्विक खेल प्रतियोगिताएं नहीं, बल्कि बड़े आर्थिक और राजनीतिक हितों का मंच बन जाते हैं। तानाशाही हमेशा वर्दी पहनकर नहीं आती। कभी वह मुस्कुराते हुए ट्रॉफी थमाती है, कैमरों के सामने तस्वीरें खिंचवाती है और पर्दे के पीछे नियमों को अपने अनुकूल बदल देती है।
खेल संगठनों पर दबाव, प्रसारण अधिकारों पर नियंत्रण, खिलाड़ियों को वीजा के नाम पर रोकना या सुरक्षा कारणों का हवाला देकर प्रतिस्पर्धा को प्रभावित करना—ये सभी संकेत खेलों की स्वायत्तता के लिए चुनौती हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इन पर अक्सर तालियों और चमक-दमक का पर्दा डाल दिया जाता है। दर्शकों का उत्साह, विज्ञापनों की चकाचौंध और प्रसारण की भव्यता के बीच कोई यह सवाल नहीं पूछता कि निर्णयों पर प्रभाव किसका है।
इतिहास गवाह है कि जब-जब खेलों को राजनीतिक हथियार बनाया गया, खेल भावना को नुकसान पहुंचा। 1936 के ओलंपिक हों या 1980 और 1984 के बहिष्कार, हर बार खिलाड़ियों के सपनों पर राजनीति भारी पड़ी। आज भी सबसे अधिक नुकसान उन खिलाड़ियों का होगा, जो वर्षों तक केवल एक पदक के लिए कठिन परिश्रम करते हैं। केन्या का धावक, क्यूबा का मुक्केबाज या भारत की पहलवान—इनके पास न प्रभावशाली लॉबी है, न आर्थिक ताकत। इनके पास केवल प्रतिभा और मेहनत है। यदि खेल भी शक्ति प्रदर्शन का माध्यम बन गया, तो निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा का सपना कमजोर पड़ जाएगा।
अब समय आ गया है कि फीफा, अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति और अन्य खेल संस्थाएं अपनी स्वायत्तता और निष्पक्षता को मजबूत करें। छोटे और विकासशील देशों को भी एकजुट होकर खेलों में समान अवसर और निष्पक्ष व्यवस्था की आवाज उठानी होगी। मीडिया की जिम्मेदारी भी केवल स्कोर और रिकॉर्ड तक सीमित नहीं हो सकती। उसे खेलों के पीछे चल रही नीतियों और प्रभावों पर भी गंभीर चर्चा करनी होगी। खेल मानवता की उन विरल जगहों में से एक है, जहां जाति, रंग, भाषा और सीमाओं से ऊपर उठकर केवल प्रतिभा का सम्मान होता है। यदि यहां भी शक्ति और राजनीति हावी हो गई, तो हार किसी एक खिलाड़ी की नहीं, पूरी खेल भावना की होगी।
















