भोपाल, 08 जुलाई।
भोपाल स्टेशन की छत से पानी झरने की तरह बहा। यह सिर्फ बारिश की घटना नहीं थी, बल्कि व्यवस्था की नाकामी का आईना थी। सवाल सीधा है कि करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी बुनियादी ढांचा पहली ही बारिश में क्यों चरमरा गया और इस बड़ी लापरवाही के लिए आखिर जिम्मेदार कौन है?
किसी भी सरकारी परियोजना की गुणवत्ता उसकी निर्माण प्रक्रिया से तय होती है। जब छत से पानी रिसता है तो इसका अर्थ है कि वाटरप्रूफिंग में घटिया सामग्री का इस्तेमाल हुआ होगा, ढलान सही नहीं बनाया गया होगा या जोड़ों पर सीलेंट का काम ठीक से नहीं हुआ होगा। टेंडर लेने के बाद लागत बचाने के लिए अक्सर ठेकेदार निर्धारित मानकों से समझौता कर लेते हैं और यदि निगरानी कमजोर हो तो ऐसी खामियां आसानी से छिप जाती हैं। रेलवे के इंजीनियरिंग और निर्माण विभाग के अधिकारियों, साइट इंजीनियरों और गुणवत्ता नियंत्रण टीम को हर चरण में निरीक्षण करना चाहिए था। हैंडओवर से पहले थर्ड पार्टी परीक्षण और मानसून पूर्व मॉक टेस्ट भी अनिवार्य होने चाहिए थे। यदि ये नहीं हुए तो यह स्पष्ट लापरवाही है और यदि हुए, फिर भी खामी रह गई तो जांच रिपोर्ट पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
करोड़ों रुपये का बजट किस आधार पर स्वीकृत हुआ और भुगतान किन गुणवत्ता प्रमाणपत्रों के आधार पर किया गया, इसकी भी जवाबदेही तय होनी चाहिए। अक्सर जल्दबाजी में उद्घाटन कर अधूरे कार्यों को पूरा दिखा दिया जाता है, जबकि उसका खामियाजा आम नागरिक को भुगतना पड़ता है।
समाधान केवल मरम्मत नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करना है। पूरे स्टेशन की छत और ड्रेनेज का थर्ड पार्टी ऑडिट कराया जाए, परियोजना का पूरा ब्यौरा सार्वजनिक किया जाए, दोषी ठेकेदार को ब्लैकलिस्ट कर उससे वसूली की जाए और जिम्मेदार अधिकारियों पर विभागीय कार्रवाई हो। विकास का अर्थ केवल करोड़ों रुपये खर्च करना नहीं, बल्कि हर रुपये की जवाबदेही सुनिश्चित करना है।















