संपादकीय
08 Jul, 2026

ओटीटी धोखाधड़ी का डिजिटल मकड़जाल: आखिर कब टूटेगा सब्सक्राइबर की जेब पर डाका?

सर्वे में खुलासा हुआ है कि बड़ी संख्या में भारतीय उपभोक्ता ओटीटी प्लेटफॉर्म पर अपनाई जा रही भ्रामक प्रक्रियाओं, अनचाही सदस्यता और बिना स्पष्ट जानकारी के होने वाली कटौतियों से परेशान हैं।

नई दिल्ली, 08 जुलाई।

80 प्रतिशत भारतीय ठगे जाने का एहसास कर रहे हैं। यह केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि डिजिटल इंडिया के दावों पर गंभीर सवाल है। जब तक डिजिटल सेवाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित नहीं होगी, तब तक डिजिटल इंडिया का सपना अधूरा ही रहेगा। ओटीटी कंपनियां मनोरंजन के नाम पर ग्राहकों को ऐसे डिजिटल जाल में फंसा रही हैं, जहां उनकी जेब चुपचाप खाली होती रहती है। यह केवल 99 या 199 रुपये का मामला नहीं, बल्कि उपभोक्ताओं के भरोसे का प्रश्न है। जब 1.18 लाख से अधिक लोग एक स्वर में कह रहे हैं कि वे ठगे गए हैं, तो कार्रवाई तुरंत होनी चाहिए। यदि अब भी नियामक नहीं जागे, तो कल यही तरीका हर ऐप और हर वेबसाइट अपना लेगी। ग्राहक भगवान होता है, गुलाम नहीं, और लोकतंत्र में किसी को भी लूट की छूट नहीं मिल सकती।

लोकलसर्किल्स के ताजा सर्वे ने इस समस्या की गंभीरता उजागर कर दी है। देश के 324 जिलों से 1.18 लाख से अधिक लोगों ने अपनी राय दी। इनमें 61 प्रतिशत पुरुष और 39 प्रतिशत महिलाएं थीं। सर्वे के अनुसार 80 प्रतिशत भारतीय मानते हैं कि वे ओटीटी प्लेटफॉर्म पर 'डार्क पैटर्न' जैसी भ्रामक तकनीकों का शिकार हुए हैं। बढ़ती शिकायतों को देखते हुए सरकार से ओटीटी कंपनियों की मनमानी रोकने के लिए कड़े कदम उठाने की मांग की जा रही है।

डार्क पैटर्न कोई तकनीकी शब्द नहीं, बल्कि उपभोक्ताओं को भ्रमित कर उनसे अतिरिक्त पैसा वसूलने की चाल है। यूजर इंटरफेस को इस तरह डिजाइन किया जाता है कि ग्राहक अनजाने में कंपनी के पक्ष में फैसला कर बैठे। जैसे फ्री ट्रायल समाप्त होने से पहले कोई रिमाइंडर न देना और सीधे पैसे काट लेना, सदस्यता रद्द करने का विकल्प इतना छिपा देना कि वह आसानी से मिले ही नहीं, वार्षिक योजना को प्रमुखता से दिखाकर मासिक योजना को लगभग अदृश्य बना देना, या एक बार कार्ड विवरण दर्ज होने के बाद ऑटो-रिन्यूअल बंद करना बेहद कठिन बना देना। यही डिजिटल ठगी का नया चेहरा है।

सर्वे में जब लोगों से पूछा गया कि क्या उन्हें किसी ऐप, वेबसाइट या ओटीटी सेवा को बंद करने में परेशानी हुई, तो 38 प्रतिशत ने कहा कभी-कभी, 32 प्रतिशत ने कहा अक्सर और 22 प्रतिशत ने कहा बहुत ज्यादा। केवल 9 प्रतिशत लोगों ने कहा कि उन्हें कभी परेशानी नहीं हुई। यानी 91 प्रतिशत लोग किसी न किसी स्तर पर इस समस्या से जूझ चुके हैं। एक अन्य सवाल में 40 प्रतिशत लोगों ने माना कि ओटीटी सेवा बंद करने के बाद भी उनके खाते से पैसे कटते रहे। वहीं, अतिरिक्त या छिपे हुए शुल्क के बारे में पूछे जाने पर 61 प्रतिशत लोगों ने स्वीकार किया कि उनसे कई बार बिना स्पष्ट जानकारी के अतिरिक्त राशि वसूली गई। यह स्थिति उपभोक्ता अधिकारों का खुला उल्लंघन है।

इस समस्या के लिए केवल कंपनियां ही नहीं, बल्कि व्यवस्था भी जिम्मेदार है। नेटफ्लिक्स, अमेजन प्राइम, डिज्नी+ हॉटस्टार, सोनी लिव और जी5 जैसे प्रमुख प्लेटफॉर्म मुनाफे की होड़ में ग्राहकों को जटिल नियमों और लंबी शर्तों के जाल में उलझा देते हैं। दूसरी ओर, भारत में अभी तक ओटीटी प्लेटफॉर्म के लिए कोई प्रभावी और सशक्त नियामक व्यवस्था नहीं है। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 मौजूद है, लेकिन डार्क पैटर्न पर स्पष्ट और कठोर प्रावधानों का अभाव है। इसका लाभ कंपनियां खुलकर उठा रही हैं। कुछ जिम्मेदारी उपभोक्ताओं की भी है, जो बिना शर्तें पढ़े कार्ड विवरण दर्ज कर देते हैं और ऑटो-रिन्यूअल चालू छोड़ देते हैं।

दुनिया के कई देशों ने इस समस्या पर सख्ती दिखाई है। यूरोप में जीडीपीआर के तहत उपभोक्ता अधिकारों की मजबूत सुरक्षा है। अमेरिका में उपभोक्ता संरक्षण एजेंसियों ने डार्क पैटर्न अपनाने पर बड़ी कंपनियों पर करोड़ों डॉलर के जुर्माने लगाए हैं। इसके विपरीत भारत में अब तक किसी बड़ी ओटीटी कंपनी पर इस तरह की ठोस कार्रवाई नहीं हुई है।

अब समय आ गया है कि सरकार डार्क पैटर्न पर स्पष्ट कानून लागू करे। ओटीटी ऐप पर सदस्यता रद्द करने का विकल्प उतना ही आसान और स्पष्ट होना चाहिए जितना सदस्यता लेने का विकल्प होता है। ऑटो-रिन्यूअल से कम से कम सात दिन पहले एसएमएस और ईमेल के माध्यम से अनिवार्य सूचना दी जाए तथा एक क्लिक में सदस्यता समाप्त करने की सुविधा उपलब्ध हो। सेवा बंद करने के बाद यदि पैसे कटते हैं तो 48 घंटे के भीतर स्वतः रिफंड मिले और उल्लंघन करने वाली कंपनियों पर कठोर आर्थिक दंड लगाया जाए। साथ ही, उपभोक्ताओं को भी सतर्क रहना होगा। फ्री ट्रायल लेते समय सीमित राशि वाले कार्ड का उपयोग करें, ऑटो-रिन्यूअल बंद रखें, बैंक स्टेटमेंट नियमित रूप से जांचें और किसी भी अनधिकृत कटौती की शिकायत तुरंत राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन 1915 या संबंधित मंच पर दर्ज कराएं। डिजिटल सुविधा तभी सार्थक है, जब उसके साथ पारदर्शिता, जवाबदेही और उपभोक्ता का सम्मान भी जुड़ा हो।

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